महिला दिन

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महिला दिन

विजया केळकर
  महिला दिन

एक सुशीला महिला
चली अपनी राहपर -कामपर
लपेटे पदर शरीरपर
ओढे चुनर सीरपर
अज्ञात दूषित नजर
बिना किये उसकी कदर
भ्रष्ट की उसकी डगर
शीलकी निशानी उडा दी हवापर
 पर-पर- पर
सबला होनेका हुआ साक्षात्कार
सती को दी तिलांजली बनी अंगार
अहिल्या खुद बनी नुकिला पत्थर
सावित्री ने लगाई यम को ललकार
न सुधरी दूषित नजर
   तो
अपने पंखोकी  ताकद को पहचान
लेगी ऊंची और ऊंची उडान
किसी दिन की ना मोहताज,ये महिला महान
 खाना खिलायेगी ,हो जाओगे गुलाम
 खिजाओगे करेगी कां तमाम
 करना उसे सलाम ,
   करना उसे सलाम

     विजया केळकर _____
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Re: महिला दिन

विजया केळकर
कविता हिंदीत आहे
 आजच्या महिला दिना  निमित्त चालेल असे वाटले