नवरात्र

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नवरात्र

विजया केळकर
अखंड दिवा लाविला देव्हारी
 आली आली जगदंबेची स्वारी
अलगद फुले वेचली
  शेवंतीची वेणी गुंफली
लक्ष्मीची पावले उमटली
  स्वागत रांगोळी नटली
लक्षवेधक कुसुमांच्या ओळी
 हार - तोरणे बांधली
कापूराचा वास , दरवऴ घरभर
   धूप - ऊद  घाली मादक भर
कास धरू भक्तीची
  सारी माया आदिशक्तिची
करवीरपुरवासिनी अंबाबाई
     तुचि देवी बंदीजाई
रंग  साडी-चोळीचा रोज नवा
   त्यास शोभेसा साजही हवा
दीप्ति किती ही मुखावरी
   प्रसन्नता  भरली अंतरी
 करूनी होम-हवने करू सांगता
     ओटी भरा ग ओटी भरा आता
रमाई, गौराई  तूचि वागेश्वरी
     सदैव कृपादृष्टी ठेवी आम्हावरी
                         विजया केळकर_______
                         (१७/११/१६ )