कविता

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कविता

Kasturimitra

आज भी याद आते है वो दिन
जब हम आपके आशिक हुआ करते थे
तुम तो शर्माके चली जाती थी
और हम वो पल सजाने लगते थे


सुरत आपकी नूर कि तरहा
इन मासूम अखियों को तरसाने लगती थी
हर शाम आपके आंगन मे
महफिल शुरू करती थी


क्या दिन थे वो तुम्हे बताऊ
जो गहरी निंदोमें मे शुरू होते थे
हर याद को सिनेसे लगाकर
सपने सुहाने बनते थे


क्या बेवफाई हमसे हो गयी
वो बात आपसे पुछनी थी
जमानेसे वफाई  करते करते
क्यूँ हमसे इतना रुठती थी



                    प्रणव प्रभू